Dard Manjta Hai

First Edition

About This Book

हिंदी साहित्य के समृद्ध महासागर में लेखक भी अपने संचित, घनीभूत अनुभव के साथ उतरा है ,अपनी एक पहचान बनाने को । कहानियां केवल मनोरंजन का ही माध्यम नहीं है ,बल्कि वह एक छोटे से फलक से बड़ी बात कहने का साधन भी हैं।कविता से ज्यादा और उपन्यास से कम जमीन मिलती है,पांव पसारने को कहानियों में ।इसमें ही कथ्य ,शिल्प ,भाव और भाषा को नवीनता के साथ इस तरह गूंथना होता है कि कृति पाठक को मनोरंजन के एक नए स्तर पर ले जाए। यही लेखक का प्रयास है ‘दर्द माँजता है..’ कहानी संग्रह में। इस संग्रह में लगभग समाज का हर चेहरा मौजूद है। ‘मेरे भगवान’ में सामाजिक मूल्यों का विकास है, वंशी लाल जैसा भोला चरित्र है, वहीं ‘छ्द्म’ में रंजीत दत्त के छल , खल की पराकाष्ठा है। लातूर भूकम्प के भयावह विभीषिका के दर्द के बीच मे विश्वास और प्रेम का नन्हा बीज उगता है,‘दर्द माँजता है’ में, परन्तु ‘एक तेरा ही साथ’ में नायक के विश्वास का हनन हो जाता है और तत्पश्चात प्रेम की उदारता और उदात्त स्वरूप दिखता है। ‘वंचित’ का नायक अपने ऐश और मौज के लिए जो व्यूह रचता है, उस में वो अपने को स्वयं फंसा हुआ पाता है। ‘परिस्थितियां’ त्रासदी में उपजती कठिनाइयों और मानवीय क्षमताओं के बीच संघर्ष और संयोजन की कहानी है।‘ट्रेन, बस और लड़की’ का इंतज़ार नही करना चाहिए, क्यों कि एक जाती है तो दूसरी आती है, आत्म सन्तुष्टि के इसी दर्शन को ये कहानी साकार करती है। सरकारी व्यवस्था में व्याप्त चापलूसी, अकर्मण्यता तथा नियोजित भ्रष्टाचार का चित्रण है ‘राजकाज ‘में। ‘कागज़ी इंसाफ’ नियमों, कानूनों की अव्यवहारिकताओं तथा व्यवस्था पर प्रश्न उठाती और दर्द उकेरती है।गांव में ज़मीन हड़पने के दाँव -पेंच, बिखरते मूल्यों के बीच घटित एक बर्फ सा ठंडा और मीठे ज़हर का बदला है ‘प्रतिशोध’में। कहानी संग्रह के amazon.in तथा लेखक के फ़ेसबुक account पर बहुत अच्छे reviews और ratings हैं।

Excerpts

सहरसा गांव में प्रवेश करने के पहले आम एवं महुआ के घने बाग से गुजरना पड़ता है ।कच्ची चौड़ी सड़क के दोनों तरफ, महुआ गूलर के पेड़ हैं और फैलाव लिए हुए आम के बाग मालदहिया, किसुली , ललेसी, बहेरिया, मिट्ठू ,गोलिया जैसे विभिन्न नाम ,आम के पेड़ों को गांव वालों ने दे रखा है। बागों में पेड़ों की मिल्कियत का कोई खास आधार नहीं ,बस वंशानुगत रूप से चला आ रहा है कि फला पेड़ फला के बाबा ने लगाया था। सामान्यतया दुपहरी में यहां ताश खेलने वालों का झुंड रहता है । जो चार-चार के समूह में गमछा बिछाये ,गमछा लपेटे जमीन पर बैठे होते हैं वह खूब जोर जोर से बीच बीच बीच में शोर मचाते हैं ।वे खूब ज़ोर -ज़ोर से बीच मे शोर मचाते हैं। परंतु आज उसी गांव में पंचायत लगी हुई है 60-70 मर्दों की भीड़ है ।बाग में ,खटिया पर बैठे हुए लोग आपस में चर्चा कर रहे हैं । मार्च की दुपहरी है इसलिए मौसम काफी खुशनुमा है ।लोग अपने पारंपरिक वस्त्र लुंगी और सिली हुई आधे बांह की बनियान में हैं। बनियान में पेट के पास बीड़ी, तंबाकू रखने के लिए गहरा जेब है ।मात्र पांच- छह लोग ऐसे हैं, जिनके बदन पर कुर्ता कमीज धोती जैसे वस्त्र हैं जिन्हें संभ्रांत कहा जा सकता है सहरसा काफी बड़ा गांव है ।यह गांव पंचायत 5 गांव की है ।तहसील- सीढ़ीपुर, ब्लाक-हंडिया, थाना – महमूद गंज, जिला -बाराबंकी ,उत्तर प्रदेश इसका मुकाम है ।उत्तर प्रदेश के नक्शे में सहरसा केवल एक बिंदु भर हो सकता है ,पर आज की पंचायत के फैसले की आखरी लाइन रामनिवास के सहरसा के दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर सकती है।

प्रतिशोध ‘ कहानी से

ऐसा पहली बार नहीं हो रहा था, पिछले दो 4 वर्षों में यह रीतापन उसे बार-बार महसूस होने लगा था। अशोका होटल के बार में एक कोने में चार दोस्त आज फिर बैठे थे, अंधेरी रोशनी तथा धुएं से सुगंधित माहौल में ।बार की नियति में अंधेरे में रहना ही है । रुक-रुककर कहकहे किसी- न -किसी कोने से आते थे ।संसार रोज यहां उत्सव सा ही होता है ।आदमी लाख उदासियों का बोझ लेकर आए पर धीरे-धीरे हल्का हो जाता है। पहले हंसकर और कभी-कभी बेहद करीबी मित्रों से रोकर ।परंतु ये हर बार अपना कर्तव्य मुकम्मल पूरा करता है । विनीत और उसके अन्य तीन मित्र आज कई वर्षों बाद मिले हैं ।इन लोगों ने बैंक की नौकरी अधिकारी के रूप में एक साथ ही ज्वाइन की थी । इस बात को 20 वर्ष हो गए हैं और जिंदगी की दौड़ में भागते-भागते ऑर्गनाइजेशन बदलते हुए फिर वापस उसी ऑर्गनाइजेशन में सीनियर पोजीशन्स पर आ गए हैं ।विनीत ने ज़्यादा तरक्की की है पर उसके मित्र भी ज्यादा पीछे नहीं है । आज दिन में एक ग्लोबल सेमिनार था बैंकों के भविष्य के ऊपर ।जिस में सम्मिलित होने के लिए यह लोग आये थे।माहौल सुबह से ही बनने लगा था ,उन पुराने दिनों की खातिर ,यादों को ताजा करने के लिए, मिलना ही होगा ,रात में ।सेमिनार की भीड़ में बहुत सारे परिचित प्रतिद्वंदी और हमराही मिले ।जिनके चेहरों पर परिचय की मुस्कान,घृणा, वितृष्णा या पहचान की चमक के पूव ही ओढ़ा हुआ रूखा अजनबीपन देखने को मिला । कारपोरेट ज़िन्दगी का ये अहम हिस्सा है। मानवीयता का सरोकार तभी तक, जब तक आप मेरे रास्ते में नहीं है और यदि आप मेरी प्राप्ति का कुछ साधन हो सकते हैं तो आप पर सारा समय न्यौछावर है। 11:00 बजे के प्रथम टी ब्रेक में विनीत ने गौर किया कि दूर वाले सोफे पर प्याजी सिल्क साड़ी में बैठी हुई स्त्री मानसी ही है।मानसी के एक हाथ में कप था ,वही कारपोरेट जैसा सफेद चौड़ा मुँह वाला ।सुंदर,पतली, गोरी बाहें , स्लीवलेस ब्लाउज में कंधों तक खुली हुई। वो एक अधपकी दाढ़ी वाले व्यक्ति से कुछ यूँ बातें कर रही थी जैसे उनका मिलना जुलना अक्सर ना होता हो ,परंतु इस तरह की गैदरिंग में हो जाता हो। उनकी बातों में जबरदस्ती संकुचित हंसने की आवृत्ति काफी थी । वे जल्दी से कुछ कहना चाहते थे और हंसना चाहते थे ।धैर्य से सुनने वाली आत्मीयता नहीं थी । जब आप किसी को लगातार देख रहे हों तो उसको किसी तरीके से सूचना हो ही जाती है ,चाहे आप उसको पीछे से ही क्यों ना देख रहे हों । मानसी लगभग उस से 20 फीट दूर बैठी थी और उस हाल में लोग लगातार आ- जा रहे थे ।यह हाल कुछ अर्धवृत्ताकार है ,जिसका फैलाव काफी विस्तृत है। दीवारों के पास सोफे लगे हुए हैं और कुछ सोफे विपरीत दिशा में यूं ही रखे गए हैं। 20 -25 फीट ऊपर लोहे की मोटी -मोटी पाइपें हैं जो ट्रस बनाकर छत को संभाले हुए हैं ।एयर कंडीशनिंग डक्ट को अंतरराष्ट्रीय स्तर के सेमिनार करने के लिए बनाया गया है ।मानसी ने नोट किया कि दो आंखें लगातार उसे देख रही हैं। एक पल को नजरें मिली फिर जैसे छिटकते हुए हट गयीं । मानसी की मुस्कुराहटअचानक लुप्त हो गई और लगभग वार्तालाप बंद करते हुए वो एक तरफ को तेजी से चली गई।

’वंचित ‘ कहानी से

पिछले 10 साल में सरकारों की तरह सुनवाई करने वाले जज भी 4 बार बदल चुके हैं ।इसलिए जज साहब ने पूरी केस फाइल मंगा कर अध्ययन करना जरूरी समझा। बरसात में सीली हुई दीवारों से पानी पी हुई मुलायम लुजलुजी फाइल कवर को किसी तरह संभालते हुए जज साहब ने पलटना शुरू किया। आज के विश्वविद्यालयों में कुकुरमुत्ता की तरह बेकार से फैले हुए शोध ग्रंथों की तरह इस फाइल मे भी पदार्थ तत्व कम ही था। ज्यादातर पन्नों पर केवल तारीख बढ़ाई गई थी । हर तारीख पर बढ़ी हुई तारीख वादियों की बढ़ती हुई दाढ़ी और उम्र पर एक चोट और मार जाती थी। उनकी आंखों से रोशनी का एक कतरा छीन जाती थी। वादी -प्रतिवादी की बहस,मिसिल पढने के बाद जो तस्वीर सामने निकल कर आई वो कुछ इस तरह थी ।

कागज़ी इंसाफ ‘ कहानी से

Synopsis

वंचित: विनीत अपने दोस्तों से 20 साल बाद मिलता है और कई वर्षों बाद मानसी से भी। वही मानसी , जिसने उसको सीढ़ी की तरह उपयोग किया और उस से आगे निकल गयी। विनीत ने अपनी आजादी और मौज मस्ती के लिए अपने को सभी पारिवारिक जिम्मेदारियों और बंधनों से सदा ही अपने को मुक्त रखा ।आज जब समाज में वह मित्रों के साथ बैठा है तो उसने पाया कि उसके अपने लोग भी उसे छोड़ चुके हैं वह उसकी परवाह नहीं करते। ज़िन्दगी में अचानक निर्वात कैसे आता है, वह इस कहानी में चित्रित है।

कागजी इंसाफ: रामनरेश एवं उसके साथियों को रेलवे में सरकारी कार्य में भयंकर नेगलिजेंस करने के लिए नौकरी से निकाल दिया गया था। 10 साल बाद मुकदमा लड़ कर जब वापस बहाली हुई तो सरकारी व्यवस्था ने ज्वाइन कराने में देर लगाई और वह बिना जॉइन किये ही मर गया। अब एक पेंच फंस कर रह गया, जिस से उसके परिवार की ज़िंदगी खत्म सी हो गयी।इस देश मे ऐसे ही कागज़ी इंसाफ मिलते हैं।

दर्द माँजता है : क्षितिज और उसके तीन दोस्त दिल्ली में रहकर सिविल सर्विसेज की तैयारी करते हैं ।1993 में जब लातूर में भूकंप आया तो इस स्थिति की भयावहता से विह्वल होकर सहायता के लिए वे वहां चले जाते हैं ।इस दर्द और विनाश के माहौल में एक प्यार और ज़िन्दगी पनपती है क्षितिज और वंदना के बीच में।

परिस्थितियां: जब किसी प्रियजन की मौत शाम को हो जाए तो दाह संस्कार के लिए अगला दिन होने का रात भर इंतजार करना पड़ता है फिर पूरी रात उसके परिजनों के लिए कैसे त्रासद हो जाती है । ऐसी ही दो परिस्थितियां हरिप्रसाद शर्मा ने झेलीं।

ट्रेन, बस और लड़की : इंजीनियरिंग कॉलेज के 3 दोस्त हैं उनमें से एक औसत लुक पर संजीदा दिल के लड़के को दो बार प्यार होता है। पहला प्यार कॉलेज में, और दूसरा उसके बाद। जब उसको लगने लगता है कि लड़की उससे पट गई है ,तभी उसको झटका मिलता है। दूसरा झटका रोमांचक है, जो एक खेल की तरह है। दोस्त समझा देते हैं कि ट्रेन, बस और लड़की के लिए परेशान नहीं होते ,एक जाती है तो दूसरी आती है।

वंचित: विनीत अपने दोस्तों से 20 साल बाद मिलता है और कई वर्षों बाद मानसी से भी। वही मानसी , जिसने उसको सीढ़ी की तरह उपयोग किया और उस से आगे निकल गयी। विनीत ने अपनी आजादी और मौज मस्ती के लिए अपने को सभी पारिवारिक जिम्मेदारियों और बंधनों से सदा ही अपने को मुक्त रखा ।आज जब समाज में वह मित्रों के साथ बैठा है तो उसने पाया कि उसके अपने लोग भी उसे छोड़ चुके हैं वह उसकी परवाह नहीं करते। ज़िन्दगी में अचानक निर्वात कैसे आता है, वह इस कहानी में चित्रित है।

छद्म:IAS पिता के रसूख से और बहुत अच्छी योजना के बदौलत एक विदेशी लड़की के बलात्कार का अभियुक्त किस तरह से इस देश मे एक छद्म नाम और पता पा लेता है। इतना ही नही , इस नए अवतार से वह सरकारी बैंक में अधिकारी की नौकरी की दहलीज तक पहुंच गया ।इंटरव्यू बोर्ड के चेयरमैन के मात्र शक की वजह से पूरा राज खुला।

राजकाज: सरकारी व्यवस्था में लापरवाही और अकर्मण्यता भरी हुई है ।इस अकर्मण्यता के कारण अक्सर ही आपात की स्थितियां पैदा की जाती है । इमरजेंसी भी पैसा कमाने का एक अवसर है। रेलवे के एक मंझे हुए अधिकारी न कैसेे आपात स्थिति पैदा की और उसमें से मलाई निकाली, यही राजकाज है इस देश का।ब्यूरोक्रेसी का फोकस केवल हुक्म की तुरंत फरमा बरदारी और चापलूसी तक रह गया है।

एक तेरा ही साथ : ताड़क देव एक निम्न औसत व्यक्ति है ।जो अपनी सरकारी नौकरी की बदौलत एक बहुत सुंदर लड़की का पति बन जाता है ।वह उसके प्रेम में पागल है नौकरी से बाहर जाने पर उसकी पत्नी किसी और के साथ एक होटल में पकड़ी जाती है । फिर घृणा और करुणा का खेल चलता है आखिर क्या जीतता है, वह एक तेरा ही साथ कि कहानी है।

प्रतिशोध : एक गांव में राम निवाज के खेत, राम सहाय द्वारा बहला-फुसलाकर कर्ज देकर कब्जा कर लिए गए। जमीन से बेदखल होने के बाद रामनिवाज लखनऊ में साढू के साइकिल की दुकान पर मजदूरी करने लगे । साढू की मदद से बेटे को पढ़ा लिखा कर कंपाउंडर बनाया। और वह गांव के ही अस्पताल में नियुक्त हो गया। सहाय को बुढ़ापे में TB हो गई, तो उसके बेटों ने घर से निकाल दिया। निवाज की सह्रदयता और सदाशयता थी कि उसने सहाय को गले लगाया और बेटे को उसका इलाज करने को कहा। जब वह लगभग ठीक हो गया तो प्रतिशोध क्यों और कैसे लिया?

Second Edition

पुस्तक का द्वितीय संस्करण फरवरी, 2019 में नए कवर पेज के साथ आ गया है। बहुत रुचि के साथ इसका कवर पेज डिज़ाइन हुआ है जिसमे कई पाठकों के उत्साही चित्र एक कोलाज के रूप में सुशोभित हैं। बहुत लोग छूट भी गए , जिन्हें इसमें शामिल न किया जा सका। वर्ष 2018 में अमेज़न पर भारतीय भाषा श्रेणी में 5 सर्वाधिक लोकप्रिय पुस्तकों में इस पुस्तक का वजूद रहा। इस संस्करण में वर्तनी की अशुद्धियां दूर कर दी गयी हैं। कहानी के स्तर पर बिना मूल कहानी या भाव मे परिवर्तन किए जहां जो खटक रहा था या बहाव में बाधा जैसे दिख रहे थे उन्हें हटा कर कहानी को प्रवहमान बना दिया गया है। इससे लज्जत भी बढ़ी है ।पुस्तक को पढ़ने में आसान बनाने के लिए फॉन्ट साइज भी बढ़ा दिया गया है। पुस्तक के पेज 112 से 120 हो गए हैं। इसका मनोरंजन का तत्व भी बढ़ गया है। पर बिना डुबकी लगाये गहराई आंक पाना मुश्किल होगा। इसलिए एक बार डूब कर देखिए।

पढ़ाई से इंजीनियर , व्यवसाय से ब्यूरोक्रेट तथा फितरत से साहित्यकार हैं ‘ रणविजय’।

“दुनिया में ज्यादातर लोग सीधी लाइन में ही चलना चाहते हैं, बस वे बार-बार भूल जाते हैं कि यहाँ कोई सड़क सीधी नहीं है।

-रणविजय

( भोर: उसके हिस्से की )