बदलते हुए चरित्रों की दास्तान –

दैनिक जागरण, दिनांक 27 मई , 2018

हाल ही में आए कहानी संग्रह संग्रह ‘दर्द माँजता है’ का शीर्षक लेखक के निजी अनुभवों को प्रतिबिंबित करता है। कहानीकार “रणविजय” रेलवे से जुड़े हैं । उन्होंने रेलवे की जिंदगी को बेहद करीब से देखा है ,यही वजह है कि उनकी कई कहानियों में रेलवे की दुश्वारियों, चुनौतियों का अक्स है। दो कहानियां ‘राजकाज ‘और ‘कागजी इंसाफ’ रेलवे में नौकरशाही, कमीशनखोरी, ठेकेदारी के गठजोड़ की परत- दर- परत उधेड़ती हैं । कहानी ‘वंचित’ इस शाश्वत सत्य को मजबूती से पेश करती है कि समर्पण और ईमानदारी ही दांपत्य जीवन का मूल आधार है। ‘एक तेरा ही साथ ‘ में कहानी का मुख्य किरदार अपनी बेवफा पत्नी को माफ कर देता है। लेखक ने इस मर्म को समझाने की कोशिश की है कि घर टूटने- बिखरने से बचाने के लिए हमारी सोच व्यापक होनी चाहिए। यही नहीं इस कहानी के जरिए यह भी संदेश मिलता है कि पुरुषों की सोच में तेजी से बदलाव आ रहा है। यानी अगर पुरुष की गलती क्षम्य है तो स्त्री की भूल को क्यों माफ नहीं किया जा सकता?
कहानी संग्रह में १० कहानियां हैं, जिनमें जीवन के अलग-अलग रंग-रूप देखने को मिलते हैं। कहानियों में नयापन और प्रयोगधर्मिता है। कहानी ‘प्रतिशोध’ में इसकी झलक मिलती है। इस कहानी में एक सूदखोर ने नायक का घर- बार ,खेत -खलियान गिरवी रखकर उसे शहर की तंग गलियों में जैसे- तैसे जीवन यापन करने को मजबूर किया, तो नायक ने इंसुलिन की ओवरडोज देकर उसे मौत की नींद सुला दिया। यह एक नए तरह का कथानक है। आमतौर पर इस तरह की कहानियों का अंत सूदखोर के प्रायश्चित या उसके साथ घटित किसी दैवीय घटना के साथ होता है। यानी नए लेखकों की कहानियों में पात्रों के चरित्र भी बदल रहे हैं।