हम और हमारी दुनिया

हम अपनी दुनिया खुद बुनते हैं।अगर हमने फेसबुक या व्हाट्सप्प पर एक ग्रुप और कुछ फॉलोवर बना लिए तो हमारे अटेंशन में केवल उन तक की बातें ही आती हैं। ये रियल लाइफ और वर्चुअल लाइफ फ्रेंड्स दोनों पर लागू है। 
फ़र्ज़ कीजिये, आप अचानक शेयर में ट्रेड करने लगे। और पहले 10दिनों में आपको 20000 का मुनाफा हो गया। फिर आपकी दुनिया मे cnbc आवाज़, ndtv प्रॉफिट, तरह तरह के कैपिटल, मनी, फाइनेंसियल, इकोनॉमिक्स जैसे रिसर्चर, कंपनी इत्यदि लोगों के फोन, मैसेज, चैट, इत्यादि ही आएंगे।दोस्त भी उसी फील्ड के बनेंगे। दिन रात दिमाग भी उसी में व्यस्त रहेगा। धुन भी वही रहेगी। जब तक कि हमारा ये गुब्बारा किसी दिन फूट न जाये या कोई हमारा चश्मा निकाल फेंक न दे। इसका होना भी ज़रूरी है कुछ दिनों बाद।
ध्यान रहे, परिवर्तन प्रकृति का नियम है।
शोहरत एड्रेनैलिन है और ज़्यादा दौड़ाती है।
दौलत नशा है और ज़्यादा मांगता है।
सृजनशीलता पागलपन है, जो प्रशंसा से बढ़ता है।

ज़िन्दगी इसी सांप सीढ़ी में है। कब सांप है कब सीढ़ी है, ये भी देख कौन रहा है, इस पर निर्भर है।

चित्र -साभार इंटरनेट

Leave a Reply

Your email address will not be published.