Excerpt

सहरसा गांव में प्रवेश करने के पहले   आम एवं महुआ के घने बाग से गुजरना पड़ता है ।कच्ची चौड़ी सड़क के दोनों तरफ, महुआ गूलर के पेड़ हैं और फैलाव लिए हुए आम के बाग  मालदहिया, किसुली , ललेसी, बहेरिया, मिट्ठू ,गोलिया जैसे विभिन्न नाम ,आम के पेड़ों को गांव वालों ने दे रखा है। बागों में पेड़ों की मिल्कियत का कोई खास आधार नहीं ,बस वंशानुगत रूप से चला आ रहा है कि फला पेड़ फला के बाबा ने लगाया था। सामान्यतया दुपहरी में यहां ताश खेलने वालों का झुंड रहता है । जो चार-चार के समूह में गमछा बिछाये ,गमछा लपेटे जमीन पर बैठे होते हैं वह खूब जोर जोर से बीच बीच बीच में शोर मचाते हैं ।वे खूब ज़ोर -ज़ोर से बीच मे शोर मचाते हैं।

परंतु आज उसी गांव में पंचायत लगी हुई है  60-70 मर्दों की भीड़ है ।बाग में ,खटिया पर बैठे हुए लोग आपस में चर्चा कर रहे हैं । मार्च की दुपहरी है इसलिए मौसम काफी खुशनुमा है ।लोग अपने पारंपरिक वस्त्र लुंगी और सिली हुई आधे बांह की बनियान में हैं। बनियान में पेट के पास बीड़ी, तंबाकू रखने के लिए गहरा जेब है ।मात्र पांच- छह लोग ऐसे हैं, जिनके बदन पर कुर्ता कमीज धोती जैसे वस्त्र हैं जिन्हें संभ्रांत कहा जा सकता है

सहरसा काफी बड़ा गांव है ।यह गांव पंचायत 5 गांव की है ।तहसील- सीढ़ीपुर, ब्लाक-हंडिया, थाना – महमूद गंज, जिला -बाराबंकी ,उत्तर प्रदेश इसका मुकाम है ।उत्तर प्रदेश के नक्शे में सहरसा केवल एक बिंदु भर हो सकता है ,पर आज की पंचायत के फैसले की आखरी लाइन रामनिवास के सहरसा के दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर सकती है।

-’ प्रतिशोध  ‘ कहानी से ( दर्द माँजता है..पुस्तक से )

ऐसा पहली बार नहीं हो रहा था, पिछले दो 4 वर्षों में यह रीतापन उसे बार-बार महसूस होने लगा था। अशोका होटल के बार में एक कोने में चार दोस्त आज फिर बैठे थे, अंधेरी रोशनी तथा धुएं से सुगंधित माहौल में ।बार की नियति में अंधेरे में रहना ही है । रुक-रुककर कहकहे किसी- न -किसी कोने से आते थे ।संसार रोज यहां उत्सव  सा ही होता है ।आदमी लाख उदासियों का बोझ लेकर आए पर धीरे-धीरे हल्का हो जाता है। पहले हंसकर और कभी-कभी बेहद करीबी मित्रों से रोकर ।परंतु ये हर बार अपना कर्तव्य मुकम्मल पूरा करता है ।

विनीत और उसके अन्य तीन मित्र आज कई वर्षों बाद मिले हैं ।इन लोगों ने बैंक की नौकरी अधिकारी के रूप में एक साथ ही ज्वाइन की थी । इस बात को 20 वर्ष हो गए हैं और जिंदगी की दौड़ में भागते-भागते ऑर्गनाइजेशन बदलते हुए फिर वापस उसी ऑर्गनाइजेशन में सीनियर पोजीशन्स पर आ गए हैं ।विनीत ने ज़्यादा तरक्की की है पर उसके मित्र भी ज्यादा पीछे नहीं है ।

आज दिन में एक ग्लोबल सेमिनार था बैंकों के भविष्य के ऊपर ।जिस में सम्मिलित होने के लिए यह लोग आये थे।माहौल सुबह से ही बनने लगा था ,उन पुराने दिनों की खातिर ,यादों को ताजा करने के लिए, मिलना ही होगा ,रात में ।सेमिनार की भीड़ में बहुत सारे परिचित प्रतिद्वंदी और हमराही मिले ।जिनके चेहरों पर परिचय की मुस्कान,घृणा, वितृष्णा या पहचान की चमक के पूव ही ओढ़ा हुआ रूखा अजनबीपन देखने को मिला । कारपोरेट ज़िन्दगी का ये अहम हिस्सा है। मानवीयता का सरोकार तभी तक, जब तक आप मेरे रास्ते में नहीं है और यदि आप मेरी प्राप्ति का कुछ साधन हो  सकते हैं तो आप पर सारा समय न्यौछावर है।

11:00 बजे के प्रथम टी ब्रेक में विनीत ने  गौर किया कि दूर वाले सोफे पर प्याजी सिल्क साड़ी में बैठी हुई स्त्री मानसी ही है।मानसी  के एक हाथ में कप था ,वही कारपोरेट जैसा सफेद चौड़ा मुँह वाला ।सुंदर,पतली, गोरी बाहें , स्लीवलेस ब्लाउज में कंधों तक खुली हुई। वो एक अधपकी दाढ़ी वाले व्यक्ति से कुछ यूँ बातें कर रही थी जैसे उनका मिलना जुलना अक्सर ना होता हो ,परंतु इस तरह की गैदरिंग में हो जाता हो। उनकी बातों में जबरदस्ती संकुचित हंसने की आवृत्ति काफी थी । वे जल्दी से कुछ कहना चाहते थे और हंसना चाहते थे ।धैर्य से सुनने वाली आत्मीयता नहीं थी ।

जब आप किसी को लगातार देख रहे हों   तो उसको किसी तरीके से सूचना हो ही जाती है ,चाहे आप उसको पीछे से ही क्यों ना देख रहे हों । मानसी लगभग उस से 20 फीट दूर बैठी थी और उस हाल में लोग लगातार आ- जा रहे थे ।यह हाल कुछ अर्धवृत्ताकार है ,जिसका फैलाव काफी विस्तृत है। दीवारों के पास सोफे  लगे हुए हैं और कुछ सोफे विपरीत दिशा में यूं ही रखे गए हैं। 20 -25 फीट ऊपर लोहे की मोटी -मोटी पाइपें हैं जो ट्रस बनाकर छत को संभाले हुए हैं ।एयर कंडीशनिंग डक्ट को अंतरराष्ट्रीय स्तर के सेमिनार करने के लिए बनाया गया है ।मानसी ने नोट किया कि दो आंखें लगातार उसे देख रही हैं। एक पल को नजरें मिली फिर जैसे छिटकते हुए हट  गयीं । मानसी की मुस्कुराहटअचानक लुप्त हो गई और लगभग वार्तालाप बंद करते हुए वो एक तरफ को तेजी से चली गई।

-’वंचित ‘ कहानी से ( दर्द माँजता है..पुस्तक से )

“ हेलो”

“ …हां. जी “ आश्चर्य मिश्रित भाव से ।

“अरे, मैं सुबह 8:00 बजे पहुंच गया था”  कुछ फुसफुसाते खिसियाते हुए विनीत बोला।

“…हूँ “

“अभी मेरे कुछ दोस्त मिल गए हैं ,उन्हीं के साथ कनॉट प्लेस में एक बार में बैठे हैं”

“…पर मुझे क्यों बता रहे हो?

“अरे! यूं ही बता रहा हूं, …बताना नहीं चाहिए था क्या?”

“आज तक तो कभी बताया नहीं आपने, कहां जा रहे हो? कब आओगे? कब पहुंचे?… बच्चों से ही फोन करके पुछवाना  पड़ता है तो आज क्या हो गया… ? “ स्वर में थोड़ी तल्खी थी।

विनीत झुंझलाने  लगा-

“ अरे! बता रहा हूं तो भी मुसीबत है”

“अच्छा ठीक है।” साधना ने संभालते हुए बोला।

“ बच्चे कहां हैं?

“बच्चों को मैं सुला चुकी हूं। सवेरे से स्कूल है।”

“अच्छा….”

“…..”

“……”

देर तक संवादहीनता की शांति रही। यह लमहा  बड़ा भारी लगने लगा ।विनीत कुछ निश्चय न कर पाया कि आगे क्या कहे।

-’वंचित ‘ कहानी  से ( दर्द माँजता है..पुस्तक से )

पिछले 10 साल में सरकारों की तरह सुनवाई करने वाले जज भी 4 बार बदल चुके हैं ।इसलिए जज साहब ने पूरी केस फाइल मंगा कर अध्ययन करना जरूरी समझा। बरसात में सीली  हुई दीवारों से पानी पी हुई मुलायम लुजलुजी फाइल कवर को किसी तरह संभालते हुए जज साहब ने पलटना शुरू किया। आज के विश्वविद्यालयों में कुकुरमुत्ता की तरह बेकार से फैले हुए शोध ग्रंथों की तरह इस फाइल मे भी  पदार्थ तत्व कम ही था। ज्यादातर पन्नों पर केवल तारीख बढ़ाई गई थी । हर तारीख पर बढ़ी हुई तारीख वादियों की बढ़ती हुई दाढ़ी और उम्र पर एक चोट और मार जाती थी। उनकी आंखों से रोशनी का एक कतरा छीन जाती थी। वादी -प्रतिवादी की बहस,मिसिल पढने के बाद जो तस्वीर सामने निकल कर आई वो  कुछ इस तरह थी ।

-’ कागज़ी इंसाफ ‘ कहानी  से ( दर्द माँजता है..पुस्तक से )


दर्द जोड़ता है। सुख तोड़ता है , ईर्ष्या से । दर्द माँजता भी है, करुणा और संवेदना देता है। दर्द महान है, मानवीयता देता है।