About This Book

इस संग्रह में लगभग समाज का हर चेहरा मौजूद है। ‘मेरे भगवान’ में सामाजिक मूल्यों का विकास है, वंशी लाल जैसा भोला चरित्र है, वहीं ‘छ्द्म’ में रंजीत दत्त के छल , खल की पराकाष्ठा है। लातूर भूकम्प के भयावह विभीषिका के दर्द के बीच मे विश्वास और प्रेम का नन्हा बीज उगता है, ‘दर्द माँजता है’ में, परन्तु ‘एक तेरा ही साथ’ मे नायक के विश्वास का हनन हो जाता है और ततपश्चात प्रेम की उदारता और उदात्त स्वरूप दिखता है। ‘वंचित’ का नायक अपने ऐश और मौज के लिए जो व्यूह रचता है, उस मे वो अपने को स्वयं फंसा हुआ पाता है। ‘परिस्थितियां’ त्रासदी में उपजती कठिनाइयों और मानवीय क्षमताओं के बीच संघर्ष और संयोजन की कहानी है।‘ट्रेन, बस और लड़की’ का इंतज़ार नही करना चाहिए, क्यों कि एक जाती है तो दूसरी आती है, आत्म सन्तुष्टि के इसी दर्शन को ये कहानी साकार करती है। सरकारी व्यवस्था में व्याप्त चापलूसी, अकर्मण्यता तथा नियोजित भ्रष्टाचार का चित्रण है ‘राजकाज ‘में। ‘कागज़ी इंसाफ’ नियमों, कानूनों की अव्यवहारिकताओं तथा व्यवस्था पर प्रश्न उठाती और दर्द उकेरती है।गांव में ज़मीन हड़पने के दाँव -पेंच, बिखरते मूल्यों के बीच घटित एक बर्फ सा ठंडा और मीठे ज़हर का बदला है ‘प्रतिशोध’में।