#Depression, #अवसाद

#i_love_lowsज़िन्दगी अक्सर ही उतार चढ़ाव सी होती है। जिसे गणित और इंजीनियर साइन कर्व भी कहते हैं। साइन जितनी निरन्तरता या सम अवधि दुख सुख की हो ,ज़रूरी नही।फकत सच इतना है कि हर उतार का एक लोवेस्ट पॉइंट भी होता है,जिसे गणित में मिनिमा कहते हैं, यहां से फिर आप उठान पर होते हैं।…

साल का अंत – अहर्निश थी मेरी वो-धन्यवाद नवोदयन दोस्तो, वीडियो क्रिएटिव के लिए

तेरी विदाई    अहर्निश थी मेरी वो, पर विदाई ज़रूरी थी,  पीड़ा की गहराइयों से, अब रिहाई ज़रूरी थी।  चेतना के हर पल क्षण में, सर्वव्याप्त रही वो,  निशा में, तन्हाई में, ईश सी साक्षात रही वो,  रीतियों, अनरीतियों, प्रतिष्ठा की जकड़न में,  तुझको इस जन्म में हासिल न कर पाऊंगा  पर अब इस दर्द के सागर से उतराई ज़रूरी थी।  अहर्निश थी मेरी वो, पर विदाई ज़रूरी थी।  तेरे आने की खबर से चिपकती आंखें मेरी द्वार पर  झनझनाती रहती ज़मीं पैरों तले,खुशियां मेरी अपार पर  दमक उठता हूँ स्पर्श मात्र से, उषा के सूर्योदय सा,  तुझको जाना ही पड़ता है ज़िंदगी देकर हर बार, पर  मरण की तेरी इस खुदाई के पार, दूसरी खुदाई ज़रूरी थी।  अहर्निश थी मेरी वो, पर विदाई ज़रूरी थी।  पीड़ा की गहराइयों से, अब रिहाई ज़रूरी थी।  चन्द्रोदय से सूर्योदय तक, मुश्किल वक्त गुज़रता  नर्म शय्या , शीतल कक्ष,फिर भी कांटो सा चुभता  तेरे कथनों की गूंज अनुगूंज में नखशिख डूबा मैं  तुम बन कर ,मन मे ही सवाल जवाब करता  तेरे ख्यालों की जकड़न से अब जुदाई ज़रूरी थी। अहर्निश थी मेरी वो, पर विदाई ज़रूरी थी।  तेरे रहने से होंठों पर सहज मुस्कान आते  आकाश से भी ऊंचे ज़िंदगी के अरमान आते  तेरे इनकार से भरभरा के गिर जाता है मेरा संसार  क्यों अक्सर तुम एक अबूझ पहेली हो बन जाते  चिर नींद के आगोश से, अब अंगड़ाई ज़रूरी थी  अहर्निश थी मेरी वो, पर  विदाई ज़रूरी थी।  बिफरा था इस बार मैं तेरे फिर रूठने से  मिन्नतों से मनाया, रिझाया फिर तुमने मुझे  एक चक्र पूरा कर, फिर अबोला किया तुमने  सीने में एक हूक उठी, मैं गया अपनी नींदों से,…

यमक अलंकार का उत्कृष्ट उदाहरण

कवि भूषण की कविता देखिये । एक वाक्य 2 अर्थ। यमक अलंकार। ऊंचे घोर मंदर के अंदर रहन वारी,ऊंचे घोर मंदर के अंदर रहाती हैं।कंद मूल भोग करें कंद मूल भोग करेंतीन बेर खातीं, ते वे तीन बेर खाती हैं।भूषन शिथिल अंग भूषन शिथिल अंग,बिजन डुलातीं ते वे बिजन डुलाती हैं।भूषन भनत सिवराज बीर तेरे…

‘Vanchit’ first story from my book ‘dard manjta hai’

वंचित ऐसा पहली बार नहीं हो रहा था, पिछले 2-4 बर्षो में यह रीतापन उसे बार बार महसूस होने लगा था । अशोका होटल के बार में एक कोने में 4 दोस्त आज फिर बैठे थे, अंधेरी रोशनी तथा धुएं से सुगन्धित माहौल में। बार की नियति में अंधेरें में रहना ही है। रूक रूक…