यमक अलंकार का उत्कृष्ट उदाहरण

कवि भूषण की कविता देखिये । एक वाक्य 2 अर्थ। यमक अलंकार।

ऊंचे घोर मंदर के अंदर रहन वारी,
ऊंचे घोर मंदर के अंदर रहाती हैं।
कंद मूल भोग करें कंद मूल भोग करें
तीन बेर खातीं, ते वे तीन बेर खाती हैं।
भूषन शिथिल अंग भूषन शिथिल अंग,
बिजन डुलातीं ते वे बिजन डुलाती हैं।
भूषन भनत सिवराज बीर तेरे त्रास,
नगन जड़ातीं ते वे नगन जड़ाती हैं॥

भावार्थ – ऊंचे घोर मंदर (महल) में रहने वाली स्त्रियां, ऊंचे घोर मंदर (गुफा) में रहने को विवश हैं। कंद मूल (राजघराने में खाने के प्रयोग में लाये जाने वाले जायकेदार कंद-मूल वगैरह) का भोग करने वाली कंद मूल (जंगल मे मिलने वाली जड़ इत्याादि) खाने को विवश हैं और जो तीन बेर (दिन में तीन बार) खाना खातीं थी वे तीन बेर (केवल तीन बेर) खाकर रह जाती हैं। जिनके भूषन शि‍थिल अंग (आभूषणों से शिथिल अंग) थे उनके अब भूषन शिथिल अंग (भूख से शिथिल अंग) हैं। यहां पर ख वर्ण के स्थान पर ष वर्ण का प्रयोग बड़े सुंदर ढंग से हुआ है। जिनपर विजन (पंखा) डुलाया जाता था वे आज विजन (निर्जन स्थान) पर डोलने को विवश हैं। भूषण कहते हैं कि वीर शिवाजी के डर से जो नगन जड़ाती थीं (नगों से जड़े हुए गहने पहने रहती थीं) वे नगन जड़ाती हैं (सर्दी के मौसम में भी नग्न हैं)।