बनारस टाकीज पर एक टिप्पणी

मैंने सत्य व्यास के तीनो उपन्यास पढ़े। पहला यानि बनारस टाकीज़ तब पढ़ा था जब मैने किसी नए लेखक का नाम भी नहीं सुन रखा था। एक दिन जैन बुक डिपो दिल्ली गया था . क्योंकि मै खुद लिख रहा था तो मै जानना चाह रहा था की नए लेखक कैसा लिखते हैं. ये किताब वहां पर कई किताबों के बीच उपलब्ध थी। इसे मैंने इसलिए ले लिया क्योंकि इस पर जागरण नीलसन बेस्ट सेलर लिखा था। मुझे ऐसा विश्वास था की बेस्ट सेलर शायद ऐसे ही लिखा गया होगा। मै अपनी पहली किताब लिख चूका था परन्तु इसके पहले मैंने केवल पुराने जमे लेखकों को ही पढ़ा था। न ही मै अपने जीवन में इतना समय और साहित्यिकी अभिरुचि पैदा कर पा रहा था कि किसी नए को फॉलो कर सकूं। 
कुछ दिनों बाद मैंने इसको पढ़ना शुरू किया। इतना मज़ा आया कि पूछिए मत। कॉलेज के दिन याद आ गए। इसमें दिखाई गयी दोस्ती यारी बिलकुल ऐसी ही होती थी. जहाँ पहले छत से कूद जाते थे , फिर पूछते थे क्यों कुदाया बे ? ऐसे ही कुछ हॉस्टल के दोस्तों की ये किताब है। पर इतनी ही नहीं ,आगे गंभीर भी है 
पढ़ते वक्त ऐसा लगता है जैसे आप कुछ लोगों की बातचीत सुन रहे हों. नावेल का 90 % हिस्सा लगभग संवाद में लिखा गया होगा। कम ही ऐसी कहानियां उपन्यास लिखे जा सकते होंगे जो मात्र संवाद आधारित हों. जब आप उपन्यास पढ़ रहे होते हैं तो सतर्क लेखक की निगाह कहानी खोजती रहती है। बड़ी निराशा होती है की कहानी तो लेखक लिख नहीं रहा , खाली चकल्ल्स से आनंद आ रहा है। ऐसे ही वक्त में बीच बीच में कुछ विवरण आते हैं जिनमे बहुत आनंद नहीं आया तो लगा अरे इसे सत्य व्यास क्यों लिख दिए। आखिरी के १५ पन्नों में कहानी एकदम से कूद कर आपके सामने आती है तब आप स्तभ्ध रह जाते हैं। फिर आप इधर उधर छिटपुट आपकी नज़रों से गुज़रे विवरणों को, जो यहाँ वहां बेकार पड़े दिख रहे थे , उनको जोड़ कर उनका महत्त्व समझ पाते हैं 
कहानी कहने का ये ढंग मिस्ट्री फिल्मों की याद दिलाता है ,जिसमे सब कुछ अप्पके बीच ही होता है पर आप तब तक नहीं पकड़ पाते , जब तक की आपको वहां तक न पंहुचा दिया जाए। वैसे रियल सेन्स में ये मिस्ट्री नहीं है क्योंकि इसमें पाठक से ये अपेक्षा नहीं थी। चरित्र गठन इतना शानदार है कि आप चरित्रों को लेकर अपनी दुनिया में कुछ दिन अपने साथ घुमा सकते हैं. कभी दादा बन जाइये , तो कभी जयवर्धन। कभी दोनों। इनसे मन डूब जाये तो सूरज बन जाइये वो बिलकुल हमारी तरह का है। 
मुहावरों कहावतों का ज़बरदस्त प्रयोग सोचने पर मजबूर करता है कि सत्य व्यास ने इनमे पीएचडी की होगी। जयवर्धन कैसे इतना मुहाविरा बोल सकता है? अद्भुत। 
उपन्यास लिखने में लेखक का कंप्यूटर ज्ञान , क्रिकेट , फिल्म पर विशद ज्ञान प्रकट होता है। कैसे इन सब ज्ञान को मिला कर कोई एक पकड़ के रखने वाली कहानी में बुन लेता है , ये कला लेखक से कोई सीखे। इस उपन्यास की एक खास बात है की ये साहित्यिक और लोकप्रिय जैसी तथाकथित दोनों श्रेणियों में सेतु की तरह है. आप जिधर से देखेंगे आपको उस तरफ दिखेगा। अच्छे साहित्यकार की कसौटी में जनप्रियता भी होनी चाहिए।

वैसे मैंने तय किया था की मै किताबों पर टिप्पणी की श्रेणी में सत्य व्यास की तीनो किताबों पर अपनी टिप्पणी एक साथ लिखूंगा। लेकिन इसके लिए मुझे सब दुबारा पढ़नी पद रही हैं. यकीन कीजियेगा कि मैंने बनारस टाकीज़ इस बार ज़्यादा एन्जॉय किया क्योंकि कहानी मै पहले से ही जानता था , तो मुझे कोई जल्दी नहीं थी। दिल्ली दरबार चल रही है। मुझे पता है यहाँ का सूरज ही दिल्ली गया है राहुल बन कर। 
बहुत शानदार सत्य व्यास। दिल्ली दरबार पर इसके बाद और 84 पर उसके बाद। 
-रणविजय