नई किताब से

बेलहिया एक मझौले किस्म का गाॅंव था। पूरा मुकाम ,ग्राम बेलहिया: थाना मस्तानपुर, जिला फैजाबाद। नजदीकी डामर सड़क मार्ग से लगभग 2 किमी दूर था परन्तु उस तक खड़ंजे से पहुच गया था। अभी प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना का प्रसार होना बाकी था, मगर कुछ सरकारी योजनाओं के फलीभूत आवागमन का एक वर्षानिरोधी मार्ग बन गया था। 1994 की एक रात ,7:30 बजे रामप्रताप यादव के दरवाजे खटपट बढ़ गयी। गाॅंव के ही जगराम सिंह का लड़का अपनी मोटर साइकिल से घुरघुराता हुआ किसी को लेकर पंहुचा । इतनी रात मेहमान का टपक पड़ना आफत गिरना जैसा था । 
अक्टूबर का महीना था,शाम जरा खुशनुमा ठंडी थी। चौड़े द्वार पर एक तरफ जानवरों को बांधने के लिए कच्ची मिट्टी की दीवारों पर फूस का छप्पर पड़ा था। लगभग बीच में नीम का पेड़ और आगे जाने पर घने बाॅंस की कोठियों का छोटा सा जंगल। नीम का पेड़ सुबह को दातुन , दिन में छाँव , सीजन में नीम फल , बीमारों को छल और पत्ती देता था ।दूसरी तरफ बाॅंस गाॅंव की आवश्यकता और अर्थव्यवस्था का अंग हैं। छप्पर बनाने ,डालने के लिए, खपरैल के घरों में और अन्य विभिन्न उपयोगों में सुविधानुसार काट कर ,छिल कर ,फाड़ कर उपयोग में लाया जाता है। और एक एक लट्ठा 200 रुपये में बिक कर किसान को अर्थ लाभ भी देता है। दो बैल और दो भैसे कुल चार जानवर रामप्रताप की पूॅंजी थे। वे अपने खाट पर आराम से लेटे हुए थे और इंतजार में थे कि कब खाने की थाली लगे और बुलाहट हो।
जगराम सिंह के लड़के ने पहले आवाज लगाई फिर मोटरसाइकिल । स्टार्टर की चाभी सबसे बाद में निकाली । रामप्रताप समझ न पाये कि कौन आया है? हर तरफ फैले अँधेरे में हेडलाइट की तेज रोशनी को आँखें फाड़े कौतूहल से देखते रहे कि कौन है? दालान में लटकी लालटेन मात्र डूबते को तिनके का सहारा जैसी थी। इस रोशनी में साॅंप और रस्सी दोनों में कोई फर्क नहीं कर सकता था। आकृति से ही पहचानना पड़ता था कि कौन हो सकता है? राम प्रताप ने आकृति और आवाज के मिले जुले आभास से जो तस्वीर बनाया वो जगराम सिंह के लड़के का था । परन्तु दूसरी आकृति जो जरा तन कर खड़ी थी और अच्छी लम्बाई चौड़ाई वाली थी, उसका थाह न लगा सके। इतना जरुर समझ गये कि कुसमय कोई पाहुना आ गिरा है ,जिसकी अब खातिरदारी करनी पड़ेगी ।वे अब तक उठकर बैठ चुके थे। उन्होंने बैठे ही बैठे आवाज दी –
“ कहाॅं से आवत हो जगदीश?”साथे केका लाये हो?”