लिखना भी एक catharsis है। विभिन्न लोग इसे विभिन्न तरह से हासिल करते हैं। मुझे लिखकर ही प्राप्त हुआ। ज़मीन को फोड़कर, सर उठाकर बीज की तरह निकला हूँ और जाड़ा, गर्मी, बरसात, आंधी सहकर वृक्ष बना हूँ। गांव से शहर तक, नगर से महानगर तक, पैदल से साइकिल तक, फिर मोटरसाइकिल से कार तक, खेत से फार्महाउस तक, और आम से हुक्काम तक का सफर मैंने तय किया है। इस सफर में किरदार मिलते गये और कहानियाँ बनती गयीं। किरदार इतने सशक्त निकले कि वे मुझे बेचैन करते रहे और चैन तब मिला जब वे नेपथ्य से मंच पर आ गए।अब स्वयं हीबोलेंगे, सबके सामने। मैं मात्र सूत्रधार.... बोझ से केवल मुक्त हुआ हूँ।

- रणविजय

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